जैसे को तैसा

जैसे को तैसा

जैसे को तैसा

एक जंगल मे एक ऊठ रहता था वो काफी सीधा साधा था।
एक दिन वो जंगल मे अकेला घास कहा रहा था तभी सियार बहा आता है और ऊठ से बोलता है- ऊठ भाई क्या कर रहे हो।
ऊठ– कुछ नही भाई घास कहा रहा हूँ।

सियार – क्या तुम अकेले रहते हो?
ऊठ– हां भाई मैं अकेला ही रहता हूं और अकेला ही भोजन करता हूँ।

सियार – मित्र मैं भी अकेला हु और मुझे भी एक मित्र की जरुरत है।
जैसे को तैसा
ऊठ खुशी से- सच में !
सियार– हां मित्र क्या तुम मेरे मित्र बनोगे?

ऊठ हाँ बोल देता है और वो मित्र बन जाते हैं।
और अब से बे हमेशा साथ रहने लगे और जहां जाते साथ जाते और इस तरह सियार और ऊठ काफी गहरे मित्र बन जाते हैं।

ऊठ सियार की हर बात मानता था।
और फिर एक दिन सियार ने ऊठ से बोला मित्र यहां भोजन काफी कम मिलता है क्यों न नदी के उस पर जाया जाए।
जैसे को तैसाबहां बहुत से मक्का के खेत हैं आराम से पेट भरकर खाएंगे।

ऊठ मान जाता है और बे दोनों चल देते हैं ।
चलते चलते बे नदी के पास पहुच जाते हैं फिर सियार बोलता है- मित्र मैं नदी पार नही कर पाउँगा मैं बहुत छोटा हूँ। ऐसा करो तुम मुझे अपनी पीठ पे बैठा लो इस तरह हम दोनों आसानी से पार हो जाएंगे।

ऊठ ऐसा ही करता है और बे दोनों नदी पार कर लेते हैं।
और थोड़ी देर चलने के बाद बे मक्का के खेत के पास पहुच जाते हैं।

मक्का का खेत देख कर ऊठ खुश हो जाता है और बोलता है- मित्र कितना हर भरा और सुंदर खेत है मक्का खाने में मज़ा आ जाएगा, आज तो पेट भरकर खाऊंगा।
और दोनों उस खेत पर टूट पड़ते हैं।

थोड़ी देर खाने के बाद ही सियार का पेट छोटे होने के कारण जल्दी भर गया और वो ऊठ से बोला- मित्र अब चलते हैं यहां के किसानों के आने का समय हो गया है और बे आते ही होंगे। यहां से चलो बरना वो हमें पकड़ लेंगे।

चूँकि ऊठ का पेट अभी भरा नहीं था तो वो मना कर देता है। पर सियार के फिर से समझाने के बाद वो मान जाता है और बे उसी तरकीब से नदी पार करके घर बापस आ जाते हैं।
और फिर अगले दिन दोनों फिर से मक्के के खेत की ओर निकल पड़ते हैं और पुरानी तरकीब से नदी पार करके मक्के के खेत के पास पहुच जाते हैं।

फिर ऊठ बोलता है- मित्र इस बार जब तक मेरा पेट नहीं भर जाएगा हम तब तक घर बापस नहीं जाएंगे।
सियार – ठीक है मित्र तुम आराम से खाओ।

दोनों खाने पर टूट पड़ते हैं चूंकि सियार का पेट छोटा था तो जल्दी भर गया और वो ऊठ से बोला मित्र आज बहुत दिन हो गए मैंने Howl Howl Howl नही चिल्लाया।
मेरा बहुत मन कर रहा है चिल्लाने का।

ऊठ समझाते हुए कहता है- भाई अभी मत चिल्लाओ बरना खेत वाले आ जाएंगे और हम मुसीबत में पड़ जाएंगे।

पर सियार ऊठ की एक नहीं सुनता और जोर जोर से howl howl चिल्लाने लगता है।
जैसे को तैसा
उसकी आवाज़ सुन कर किसान वहां आ जाते हैं किसानों को देख सियार छोटा होने का फायदा उठाता है और खेत मे दुबक जाता है पर ऊठ उन्हें आसानी से दिख जाता है।
किसान ऊठ को बहुत बेरहमी से लाठी डंडो से पीटते है।

बे ऊठ को मार मार कर बुरा हाल कर देते हैं।
किसानों के जाने के बाद सियार बाहर आता है और बोलता है मित्र चलो चलते हैं।

सियार के इस बर्ताव से ऊठ बहुत दुखी था पर वो कुछ नही बोला और बे दोनों घर की ओर चल दिये।

रास्ते मे जब नदी किनारे पहुचे तब सियार फिर से ऊठ की पीठ पर चढ़ गया। और बे नदी पार करने लगे तभी बीच नदी में पहुचने के बाद ऊठ बोला-मित्र मुझे यहां पानी मे लोटने का मन कर रहा है।

सियार डर जाता है और घबरा कर बोलता है मित्र अभी मत लोटना, पहले मुझे उस पर पहुचा दो फिर तुम आराम से लोटना।

पर ऊठ बोलता हैं- नही मित्र मेरा बहुत ज्यादा ही मन कर रहा है, ये कह कर ऊठ नदी में लोटने लगता है।
जिससे सियार नदी में गिर जाता है और डूब कर मर जाता है और ऊठ बाद में आराम से घर चला जाता है।

शिक्षा :-कभी भी स्वार्थी दोस्तो के साथ मत रहो,जो जैसा करता है बैसा भरता है

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